बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ पर निबंध – Beti Bachao Beti Padhao Assignment/Essay in Hindi

Beti Bachao Beti Padhao Essay in Hindi

Beti Bachao Beti Padhao in Hindi language for students in 100, 200, 400, and 2500 words.

Beti Bachao Beti Padhao Essay in Hindi


दोस्तों आइए बात करते हैं बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना की शुरुआत क्यों करनी पड़ी, ऐसा क्या हुआ कि भारत जैसे पुरातन संस्कृति और अच्छे विचारों वाले देश को बेटियों को बचाने के लिए और उनको पढ़ाने के लिए एक अलग मुहिम चलानी पड़ी।

इसका सबसे मुख्य कारण तो यह है कि लोगों की मानसिकता बहुत छोटी हो गई है,  उनका बेटियों के प्रति रवैया बहुत ही खराब हो गया है और सोचने की बात तो यह है कि उन्हें ऐसा कृत्य करते हुए शर्म भी नहीं आती है।

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ऐसी सोच वाले लोग बेटी और बेटो में भेदभाव करते हैं क्योंकि वह मानते हैं कि बेटे हमारी पूरी जिंदगी भर सेवा करेंगे और बेटियां तो पराई होती हैं उनको पढ़ा लिखा कर क्या फायदा इसलिए वह बेटों को ज्यादा अच्छी शिक्षा दिलाते हैं और उन्हीं का ज्यादा ध्यान रखते हैं।

वर्तमान में उन लोगों की सोच इतनी गिर गई है कि वे लोग बेटियों को अब जन्म लेने से पहले ही मार देते हैं और अगर गलती से उनका जन्म भी हो जाता है तो उनको इसी सुनसान जगह पर फेंक आते हैं।  

हमारी सरकार ने इसके खिलाफ भी कन्या भूण हत्या को रोकने के लिए कई योजनाएं चला रखी हैं लेकिन उनका पालन अच्छी तरह से नहीं हो रहा है।

Beti Bachao Beti Padhao Par Nibandh 100 Words


बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ का नारा इसलिए दिया गया क्योंकि भारत में दिन-प्रतिदिन बेटियों की हालात खराब हो रहे हैं उनके साथ उन्हीं के माता पिता भेदभाव कर रहे हैं। वह सोचते हैं कि बेटियां तो पराई होती हैं उनकी कैसे भी जल्दी से शादी करा दो और उनको पढ़ाने-लिखाने का कोई फायदा नहीं है।

इसलिए वे बेटों पर ज्यादा ध्यान देते हैं उनकी अच्छी शिक्षा करवाते हैं और बेटियों को स्कूल में पढ़ने तक नहीं भेजते हैं।

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बेटियों के इस बिगड़ते हुए हालात को देखते हुए हमारे माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 22 जनवरी 2015 को बेटियों के हालात सुधारने के लिए बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना को प्रारंभ किया।

इस योजना का मुख्य उद्देश्य था कि बेटियों के साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव ना हो और गांव-गांव जाकर इसका प्रचार प्रसार करना था।

Beti Bachao Beti Padhao in hindi 200 Words


हमारा भारत देश पौराणिक संस्कृति के साथ-साथ महिलाओं के सम्मान और इज्जत के लिए जाना जाता था।  लेकिन बदलते समय के अनुसार हमारे देश के लोगों की सोच में भी बदलाव आ गया है। जिसके कारण अब बेटियों और महिलाओं के साथ हैं एक समान व्यवहार नहीं किया जाता है।

लोगों की सोच किस कदर बदल गई है कि आए दिन देश में कन्या भ्रूण हत्या और बलात्कार जैसे मामले देखने को मिलते रहते हैं। जिसके कारण हमारे देश की सभी इतनी खराब हो गई है कि दूसरे देश के लोग हमारे भारत देश में आने से झिझकते हैं।

हमारे देश के लोगों ने मिलकर हमारे देश में पुरुष प्रधान नीति को अपना लिया है जिसके कारण देश की बेटियों के हालात गंभीर रूप से खराब हो गए हैं।  उनके साथ लैंगिग भेदभाव किया जा रहा है और ना ही उन्हें उचित शिक्षा दी जा रही है।

जिसके कारण वह हर क्षेत्र में पिछड़ गई है। उनकी आवाज को इस कदर दबा दिया गया है कि उन्हें घर से बाहर निकलने की आजादी तक नहीं दी जाती है। इस गंभीर मुद्दे को लेकर हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक नई योजना का प्रारंभ किया जिसका नाम Beti Bachao Beti Padhao रखा गया।

इस योजना के अनुसार बेटियों की शिक्षा के लिए उचित व्यवस्था की गई है और लोगों की सोच को बदलने के लिए जगह-जगह इसका प्रचार प्रसार किया जा रहा है जिससे लोग बेटी और बेटियों में किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं करें।

Beti Bachao Beti Padhao Essay in Hindi 400 Words


आज हमारे 21वी सदी के भारत में जहां एक और चांद पर जाने की बातें हो रही हैं वहीं दूसरी तरफ भारत की बेटियां अपने घर से बाहर निकलने पर भी कतरा रही हैं। जिससे यह पता लगता है कि आज भी भारत देश पुरुष प्रधान देश है।

हमारे देश के लोगों की मानसिकता इतनी भ्रष्ट हो चुकी है कि वह महिलाओं और बेटियों का सम्मान नहीं करते हैं। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा था कि जिस देश में महिलाओं का सम्मान नहीं होता वह देश की प्रगति कभी भी नहीं हो सकती है।

हमारे देश के लोगों पर दकियानूसी सोच इतनी बड़ी हो गई है कि वे लोग अब बेटी और बेटियों में फर्क करने लगे हैं। वह बेटों को उचित शिक्षा दिलाते हैं और बेटियों को घर पर ही रहकर घर के काम सीखने को कहते हैं उन्हें किसी भी प्रकार की आजादी नहीं दी जाती है। जिसके कारण बेटियों का भविष्य अंधकार में चला गया है।

हमारे देश की बेटियां आज घर से निकलने पर भी कतराते हैं क्योंकि  कुछ लोगों ने देश का माहौल इतना खराब कर दिया है कि आए दिन हम देखते हैं कि किसी ने किसी की बहन बेटी से बलात्कार की या छेड़छाड़ की घटनाएं सामने आती रहती हैं।

यह घटनाएं हमारे देश के लोगों की सोच को दर्शाती हैं कि उनकी सोच कितनी हद तक गिर चुकी है और इस बात कि ना तो उन्हें शर्म आती है ना ही उन्हें किसी प्रकार का पछतावा होता है।

हमारे देश में दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही कन्या भ्रूण हत्या भी लोगों की मानसिकता का परिचय देती है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत को चेतावनी देते हुए कहा था कि अगर कन्या भ्रूण हत्या जैसे मामलों पर जल्द ही कोई संज्ञान नहीं लिया गया तो जनसंख्या से जुड़े संकट उत्पन्न हो सकते हैं।

बेटियों की उचित शिक्षा और उनकी सुरक्षा के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ नाम की योजना का प्रारंभ किया। इसके साथ ही उन्होंने बेटियों का महत्व भी बताया, उन्होंने कहा कि अगर बेटियां पढ़ी-लिखी नहीं होंगी तो पूरा परिवार ही अनपढ़ रह जाएगा। जिसके कारण हमारा भारत देश विकास विकासशील देश ही बनकर रह जाएगा कभी भी विकसित नहीं हो पाएगा।

उन्होंने इस योजना के माध्यम से  इस बात पर जोर दिया कि बेटियों के साथ जो भी भेदभाव हो रहे हैं उनको खत्म किया जाए और साथ ही उनको पढ़ने लिखने की भी आजादी दी जाए। बेटियों को भी अपना जीवन जीने का पूर्ण अधिकार होना चाहिए।

Beti Bachao Beti Padhao Essay in Hindi for all Students


अब हम बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ विषय पर विस्तार से निबंध लिख रहे हैं जिसमें बताया गया है कि भारत में बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ  जैसी योजनाओं की जरूरत क्यों पड़ी और इन योजनाओं का उद्देश्य क्या है। यह योजनाएं कितनी सफल रही इन सभी पर हम विस्तार से निबंध लिखेंगे। जो की बड़ी कक्षा के विद्यार्थियों को निबंध लिखने में सहायता प्रदान करेगा।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना क्या है-

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना (BBBP) महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवार कल्याण मंत्रालय एवं मानव संसाधन विकास की एक संयुक्त पहल है।  इस योजना का उद्घाटन माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 22 जनवरी 2015 को हरियाणा राज्य के पानीपत जिले में इसका उद्घाटन किया था।

क्योंकि हरियाणा राज्य में 1000 लड़कों पर सिर्फ 775 लड़कियां ही थी। जिसके कारण वहां का लिंगानुपात गड़बड़ा गया था।  इस योजना को शुरुआत में पूरे देश के 100 जिलों में जहां पर सबसे अधिक है लिंगानुपात गड़बड़ाया हुआ था वहां पर इस योजना को प्रभावी तरीके से लागू किया गया। और आगामी वर्षों में इसे पूरे देश में लागू करने की योजना है।

बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना के उद्देश्य-

1. बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना के अंतर्गत सामाजिक व्यवस्था में बेटियों के प्रति रूढ़िवादी मानसिकता को बदलना।

2. बालिकाओं की शिक्षा को आगे बढ़ाना।

3. भेदभाव पूर्ण लिंग चुनाव की प्रक्रिया का उन्मूलन कर गांव का अस्तित्व और उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना।

4. घर-घर में बालिकाओं की शिक्षा को सुनिश्चित करना।

5. लिंग आधारित भ्रूणहत्या की रोकथाम।

6. लड़कियों की शिक्षा और उनकी भागीदारी सुनिश्चित करना।

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बचाओ बेटी पढ़ाओ अभियान की जरूरत क्यों पड़ी-

हमारा भारत देश वैसे तो हमारी पौराणिक संस्कृति है धर्म-कर्म और  स्नेह और प्यार का देश माना जाता है। लेकिन जब से भारतीय नहीं तरक्की करनी चालू की है  और नई तकनीकों का विकास हुआ है तब से भारतीय लोगों की मानसिकता में बहुत बड़ा बदलाव आया है। इस बदलाव के कारण जनसंख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा उथल-पुथल हुआ है।

लोगों की मानसिकता इस कदर खराब हो गई है की वे बेटे और बेटियों में भेदभाव करने लगे है। वे बेटियों को एक वस्तु के समान मानने लगे हैं। ऐसे लोग बेटे के जन्म होने पर बहुत खुशियां मनाते हैं और पूरे गांव में मिठाइयां बटवाते है  वही अगर बेटी का जन्म हो जाए तो पूरे घर में सन्नाटा पसर जाता है जैसे कि कोई आपदा या विपदा आ गई हो। वह बेटी को पराया धन मानते हैं क्योंकि एक दिन बेटियों को शादी करके दूसरे घर जाना होता है।

इसलिए गिरी हुई मानसिकता वाले लोग सोचते हैं कि बेटियों पर किसी भी प्रकार का खर्च करना बे मतलब है।  इसलिए वे बेटियों को पढ़ाते लिखाते नहीं और ना ही उनका सही से पालन पोषण करते हैं।

उनको अपनी मर्जी से किसी भी कार्य को करने के लिए आजादी नहीं होती है। कुछ जगहों पर तो बेटियों को घर से बाहर तक नहीं निकलने दिया जाता है।

वहीं इसके विपरीत बेटों को खूब लाड प्यार किया जाता है और उनकी शिक्षा के लिए देश विदेश में भी भेजा जाता है। बेटों को हर प्रकार की छूट दी जाती है। ऐसे लोग मानते हैं कि बेटे हमारे बुढ़ापे की लाठी बनेंगे और हमारी सेवा करेंगे लेकिन आजकल सब कुछ इसके उलट हो रहा है।

बच्चों के लिंग अनुपात (सीएसआर), जो 0-6 वर्ष आयु के प्रति 1000 लड़कों के तुलना लड़कियों की संख्या से निर्धारित होता है। भारत देश के आजादी के बाद पहली जनगणना 1951 में हुई थी जिसमें पाया गया कि 1000 लड़कों पर सिर्फ 945 लड़कियां ही है लेकिन आजादी के बाद स्थिति और भी खराब होती गई जिसके आंकड़े इस प्रकार हैं-

वर्षलिंगानुपात प्रति 1000 लड़कों पर
1991945
2001927
2011918

लड़कियों की इतनी कम जनसंख्या होना यह किसी आपदा से कम नहीं है। यह बच्चे के लिंग चुनाव द्वारा जन्मपूर्व भेदभाव और लड़कियों के प्रति जन्म उपरांत भेदभाव को दर्शाता है।

इस मानसिकता के दिन प्रतिदिन बढ़ने के कारण बेटियों की जनसंख्या में कमी आने लगी क्योंकि बेटियों को गर्भ में ही मारे जाने लगा है। यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब 5 करोड़ लड़कियों की कमी है

जिसका संज्ञान लेते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ ने भारत को चेतावनी दी कि अगर जल्द ही लड़कियों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं किया गया तो भारत में जनसंख्या के बदलाव के साथ-साथ अन्य कई विपत्तिया सकती हैं।  इसलिए हमारे देश के माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेटियों की सुरक्षा और बेटियों की शिक्षा दीक्षा के लिए एक नई योजना का प्रारंभ किया जिसका नाम बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ रखा गया।

बेटियों की दुर्दशा के कारण –

भारत में जब से नई तकनीकों का विकास हुआ है लोग जब से सिर्फ अपना स्वार्थ पूरा करने के लिए जीने लगे हैं तब से बेटियों की स्थिति हमारे देश में बहुत ही दयनीय हो गई है। उनकी इस स्थिति का जिम्मेदार और कोई नहीं आप और हम ही हैं।

क्योंकि हमारे जैसे लोग ही बेटे और बेटियों में भेदभाव करने लगे हैं।  जिस कारण बेटियां देश में SS महसूस करने लगी हैं और उनकी जनसंख्या में भी काफी गिरावट आई है। कई राज्यों में तो हालात इतने खराब हो गए हैं कि वहां के युवाओं की अब शादी भी नहीं हो पा रही है।

आइए जानते हैं कि कौन से कारण हैं जिसके कारण आज हमारे देश की बेटियों की हालत गंभीर रूप से बहुत ही दयनीय हो गई है।

1. लैंगिग भेदभाव –

लैंगिग भेदभाव का मतलब है कि अब लोग बेटियों का जन्म नहीं चाहते है। वे चाहते हैं कि उनके घर सिर्फ बेटे ही पैदा हो। लेकिन वह लोग यह नहीं जानते कि अगर लड़कियों का जन्म नहीं होगा तो भी बहू कहां से लाएंगे बहन कहां से लाएंगे और साथ ही मां कहां से लाएंगे।

2. कन्या भूण हत्या –

बढ़ते लैंगिक भेदभाव के कारण अब लोगों की मानसिकता इतनी खराब हो गई है कि वे बेटियों की गर्भ में ही हत्या कर देते हैं। उनके मन में बेटे की इतनी चाहत बढ़ गई है कि वह अपनी ही बेटी को दुनिया में आने से पहले ही मार देते हैं।

जिसके कारण लड़कियों की जनसंख्या में भारी गिरावट आई है  और एक नई विपदा उभरकर सामने आई है। जिस पर ना तो लोग कुछ कदम उठा रहे हैं ना ही सरकार इस पर कुछ कर रही है। जिसके कारण आए दिन लड़कियों का शोषण हो रहा है

3. शिक्षा की कमी –

शिक्षा की कमी के कारण लोग आज भी बेटियों को बहुत मानते हैं जिसके कारण भारत जैसे देश जहां पर माताओं को पूजा जाता है। उसी देश में बेटियों का शोषण किया जाता है।

बेटियों के माता-पिता पढ़े नहीं होने के कारण वह लोगों की सुनी सुनाई बातों में आ जाते हैं और बेटियों के साथ भेदभाव करने लगते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता है कि अगर बेटियों को सही अवसर दिया जाए तो भी बेटों से ज्यादा कर कर दिखा सकती हैं।

4. भ्रष्ट मानसिकता –

भारत में लोगों की मानसिकता का इसी से पता लगाया जा सकता है कि वह बेटियों को एक वस्तु के समान मानने लगे हैं जिसको जैसे चाहे काम में ले लो और फिर फेंक दो।  लोग बेटियों को पराया धन मानते हैं उनको एक खर्चे के रूप में मानते हैं जिसके कारण देश में लड़कियों की स्थिति चिंताजनक हो गई है।

भ्रष्ट मानसिकता वाले लोग मानते हैं कि बेटे ही सब कुछ है वही उनके बुढ़ापे की लाठी बनेंगे और उनकी सेवा करेंगे।  इसलिए वे लोग अब बेटियों का जन्म तक नहीं चाहते उनकी घर में ही हत्या करवा देते हैं। इसलिए लोगों की मानसिकता बदलने का प्रयास करना चाहिए।

5. दहेज प्रथा –

हमारे देश में दहेज प्रथा बहुत गंभीर समस्या है जिसके कारण बेटियों की स्थिति चिंताजनक हो गई है। इस प्रथा के कारण लोग अब नहीं चाहते कि उनकी परिवार में बेटियां पैदा हो क्योंकि जब बेटियों की शादी की जाती है तो उन्हें बहुत सारा दहेज देना पड़ता है।

जिसके कारण लोग बेटियों को एक बहुत बड़ा खर्चा मानने लगे हैं  और बेटे और बेटियों में भेदभाव करने लगे हैं। वर्तमान में तो बेटियों को घर में ही मरवा दिया जाता है जिससे लोगों को उनकी शादी पर दहेज नहीं देना पड़े इसलिए इस प्रथा को समाप्त करना बहुत जरूरी है।

बेटियों की दुर्दशा के दुष्प्रभाव –

यह सब हमको अच्छे से ज्ञात है कि किसी भी चीज की अति या कमी किसी ना किसी विनाशकारी आपदा को  जन्म देती है। चूँकि वर्तमान समय में बेटे और बेटियों में बहुत भेदभाव किया जाने लगा है। जिसके कारण  लड़कियों की संख्या में कमी आई है और उनकी शिक्षा दीक्षा में भी बहुत कमी देखी गई है। इसका दुष्प्रभाव आज हमको देखने को मिल रहा है।

1. जनसंख्या वृद्धि –

लड़के की चाह रखने वाले लोग जब तक उनके घर लड़का पैदा नहीं हो जाता तब तक वह बच्चे पैदा करते रहेंगे जिसके कारण  भारी संख्या में जनसंख्या का विस्तार होगा। इससे हमारे देश के विकास की गति धीमी हो जाएगी जिसके कारण लोगों को उचित रोजगार व उचित भोजन नहीं मिल पाएगा।

 वैसे ही हमारा देश बहुत पिछड़ा हुआ है और अगर जनसंख्या वृद्धि इसी रफ्तार से बढ़ती रही तो हमारा देश कभी भी विकसित नहीं हो पाएगा। इसलिए लोगों को इस बारे में चर्चा करनी चाहिए और इसके विरुद्ध कुछ ठोस कदम उठाने चाहिए।

2. लड़कियों की जन्म दर कम होना –

और लोग  लड़कियों के साथ इसी तरह का भेदभाव करते रहे तो लड़कियों के जन्मदिन में  भारी संख्या में गिरावट आ सकती है जबकि भारत के बहुत से राज्य में वर्तमान समय में भी लड़कियों की जनसंख्या बहुत कम है एक आंकड़े के अनुसार वर्ष 1981 में 0 से 6 साल लड़कियों का लिंगानुपात 962 से घटकर 945 ही रह गया था और  वर्ष 2001 में यह संख्या 927 रह गई थी। 2011 आते आते तो स्थिति और भी खराब हो गई थी क्योंकि 1000 लड़कों पर लड़कियों की संख्या सिर्फ 914 ही रह गई थी जो कि एक गंभीर समस्या हो गई है।

3. बलात्कार और शोषण की घटनाएं बढ़ना –

लड़कियों की जनसंख्या कम होने के कारण आए दिन आपने एक बार और समाचारों में देखा होगा कि हमारे देश में बलात्कार जैसी घटनाएं बहुत ही तेजी से बढ़ रही है। इसका एक कारण यह भी है कि लड़कियों की जन्म दर बहुत कम हो गई है। पुरुष प्रधान समाज होने के कारण लड़कियों की जनसंख्या जहां पर कम होती है वहां पर पुरुष अपना प्रभुत्व है दिखाते हैं और लड़कियों का शोषण करने से बाज नहीं आते हैं।

4. देश का धीमी गति से विकास –

अगर लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाएगा तो देश के विकास की गति धीमी हो जाएगी क्योंकि आज भी हमारे देश में आधी जनसंख्या महिलाओं की है अगर उन्हीं को उचित शिक्षा और सुरक्षा नहीं मिलेगी तो हमारे देश के विकास की गति अपने आप ही धीमी हो जाएगी। और कहा जाता है कि पहला गुरु मां ही होती है अगर वही पढ़ी-लिखी नहीं होगी तो वह अपने बच्चों को कैसे पढ़ाएगी। इसलिए बेटियों को पढ़ाना बहुत जरूरी होता है।

लड़कियों की दुर्दशा सुधारने के उपाय –

देश में बिगड़ती हुई लड़कियों की दुर्दशा  के लिए कहीं ना कहीं आप और हम भी जिम्मेदार हैं क्योंकि जब भी लड़कियों के साथ भेदभाव या फिर उनका शोषण होता है तो हम सिर्फ देखते रहते हैं उसका विरोध तक नहीं करते हैं।

जिसके कारण आज यह स्थिति हमको देखने को मिल रही है। अगर लड़कियों से किसी प्रकार का भेदभाव हो रहा है और अगर हम उसे होते हुए देख रहे हैं तो हम भी उतने ही जिम्मेदार हैं जितना कि भेदभाव करने वाला इसलिए हमें लड़कियों के प्रति भेदभाव पूर्ण नीति के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।

नहीं तो एक दिन ऐसा आएगा कि हमारे देश में लड़कियां ही नहीं रहेंगी। सरकार भी लड़कियों के उत्थान के लिए नई नई योजनाएं लाते आती है जैसे बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ योजना महिला सशक्तिकरण योजना जैसी कई योजनाएं चलाती है लेकिन आमजन की रूचि न होने के कारण यह सभी योजनाएं ठंडे बस्ते में चली जाती हैं।

आइए देखते हैं कि हम लड़कियों की दुर्दशा सुधारने के लिए क्या उपाय कर सकते हैं –

1. लिंग जांच को रोकना –

वर्तमान में नई तकनीकों के विकास के कारण गर्भ में ही पता लगा लिया जाता है कि बच्चा लड़का पैदा होगा या लड़की तो लोग इसका फायदा उठा कर पहले ही पता लगा लेते हैं कि उन्हें लड़का पैदा होगा या फिर लड़की अगर उन्हें पता चलता है कि लड़की पैदा होने वाली है तो वे लड़की की गर्भ में ही हत्या करवा देते हैं जिसके कारण लड़कियों का लिंगानुपात निरंतर कम होता जा रहा है।

भारत में लिंग जांच करने वाली मशीनें आसानी से मिल जाती हैं इन मशीनों पर हमें तुरंत रोक लगानी चाहिए। हालांकि भारत सरकार ने इसके ऊपर एक सख्त कानून लाया है लेकिन कुछ लालची डॉक्टरों के कारण आज भी लिंग जांच होती है और लड़कियों की गर्भ में हत्या कर दी जाती है।

2. स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना –

हमें स्त्री शिक्षा को बढ़ावा देना चाहिए, अगर समाज में शिक्षित महिलाएं होंगी तो वह कभी भी अपने गर्भ में पल रही बेटियों की हत्या नहीं होने देगी। उनकी हत्या का मुख्य कारण यह है कि महिलाओं को  शिक्षा के बारे में कुछ पता नहीं होता है और उन्हें पुरानी रूढ़िवादी बातों में फंसा कर उनके परिवार वाले अपनी ही बेटी कि गर्भ में हत्या करवा देते हैं। इसलिए जितना स्त्री शिक्षा को बढ़ावा मिलेगा उतना ही लड़कियों का लिंगानुपात बढ़ेगा।

3. लड़कियों के प्रति भेदभाव को रोकना –

हमारे 21वीं सदी के भारत में जहां एक और कल्पना चावला जैसी महिलाएं अंतरिक्ष में जा रही हैं वहीं दूसरी ओर हमारे समाज के लोग लड़कियों से भेदभाव कर रहे हैं। लड़कियों से लिंग चयन के आधार पर भेदभाव किया जाता है और अगर उनका जन्म हो भी जाता है तो उनको उचित शिक्षा नहीं दी जाती है

उनका उचित पालन पोषण नहीं किया जाता है इस भेदभाव नीति के कारण लड़कियों का विकास सही से नहीं हो पाता है और वे पिछड़ी हुई रह जाती है जिसके कारण वह लड़कों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर नहीं चल पाती हैं। हालांकि वर्तमान में शहरों में लड़कियों की स्थिति में कुछ बदलाव आया है।  लेकिन इतना भी बदलाव नहीं आया है कि कहां जा सके कि लड़कियों के साथ भेदभाव नहीं हो रहा है।

4. लोगों की मानसिकता बदलना –

हमारे 21वी सदी के भारत में एक और तो लोग अपने सभ्य होने का दावा करते हैं और दूसरी ओर वह महिलाओं का शोषण करते हैं उनसे छेड़छाड़ करते हैं और बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं। यह लोग कोई और नहीं हम में से ही कुछ ऐसे लोग हैं जिनकी मानसिकता इतनी खराब हो चुकी है कि वह महिलाओं को एक वस्तु के समान भोग विलास की वस्तु मानते हैं।

ऐसे लोगों को समाज से बाहर कर देना चाहिए, यह लोग समाज के लिए ही नहीं पूरे विश्व के लिए बहुत ही खतरनाक हैं। इसलिए इन जैसी सोच रखने वाले लोगों की मानसिकता में बदलाव लाना बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि दिन प्रतिदिन ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है जिसका परिणाम आप आए दिन अखबारों और समाचारों में देखते रहते हैं।

5. लड़कियों की सुरक्षा के प्रति सख्त कानून का निर्माण करना –

भारत सरकार को लड़कियों की सुरक्षा के लिए सख्त कानूनों का निर्माण करना चाहिए जिससे कि किसी की हिम्मत ना हो लड़कियों से शोषण करने की ओर उनसे भेदभाव करने की। हालांकि सरकार ने कुछ ऐसे कानून बनाए हुए हैं जिनसे महिलाओं की सुरक्षा की जा सकती है लेकिन इन कानूनों में कुछ कमियां होने के कारण लोग इसका फायदा उठाते हैं और बलात्कार जैसी घटनाओं को अंजाम देते हैं।  

हाल ही में सरकार ने एक नया कानून लाया है जिसकी सराहना की जा सकती है जिसमें 12 साल तक की लड़कियों से बलात्कार करने पर फांसी की सजा दी जाएगी। अगर ऐसे ही सख्त कानून बनते रहे तो किसी की भी हिम्मत नहीं होगी कि लड़कियों के साथ दुर्व्यवहार करें।

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NIOS: ट्यूटर marked असाइनमेंट

NIOS Tutor Marked Assignments

नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ओपन स्कूलिंग (एनआईओएस) ने माध्यमिक और senior secondary स्तर के लिए एनआईओएस ट्यूटर marked असाइनमेंट जमा करने की तारीखों की घोषणा कर दी है.

ओपन बोर्ड से कक्षा 10 और कक्षा 12 कर रहे छात्रों को एनआईओएस द्वारा प्रदान किए गए कार्यक्रम में उल्लिखित अंतिम तिथि से पहले अपने एनआईओएस असाइनमेंट जमा करना अनिवार्य है.

छात्र इस लेख के माध्यम से TMA के बारे में सभी प्रारूप, अनुसूची साथ ही एनआईओएस असाइनमेंट के महत्व सहित सभी महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कर सकते हैं. साथ ही छात्र इसके अलावा, नीचे दिए गए आधिकारिक लिंक के माध्यम से अपने विषयों के लिए TMA डाउनलोड कर सकते हैं.

तो आइये सबसे पहले यह जानते हैं कि NIOS ट्यूटर marked असाइनमेंट क्या है?

ट्यूटर मार्कड असाइनमेंट (टीएमए) कक्षा 10 या कक्षा 12 के स्तर पर नामांकित पाठ्यक्रम द्वारा प्रस्तुत किए जाने वाले एनआईओएस असाइनमेंट हैं. जिसके अंतर्गत छात्रों द्वारा चुने गए प्रत्येक विषय के लिए, तीन असाइनमेंट होंगे, प्रत्येक असाइनमेंट 6 प्रश्नों पर आधारित होगा. छात्रों को मूल्यांकन के लिए आवंटित मान्यता प्राप्त संस्थान (AI) में सभी असाइनमेंट को पूरा कर शिक्षकों/ट्यूटर/coordinators को जमा करना अनिवार्य है.

TMA में हर प्रकार के प्रश्न छात्रों के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं, जैसे अति-लघुउत्तरीय प्रश्न, लघुउत्तरीय प्रश्न, दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न तथा प्रोजेक्ट (प्रैक्टिकल) बेस्ड प्रश्न.

NIOS असाइनमेंट का प्रारूप:

TMA 20 अंको का होगा और प्रारूप के अनुसार, 6 प्रश्न होंगे जो नीचे हम विस्तार में उल्लिखित कर रहे हैं:

  • प्रश्न 1, 2 और 3 संक्षिप्त उत्तर करने वाले प्रश्न होते हैं. प्रत्येक प्रश्न में दो विकल्प दिया जाता है जिनमें से केवल एक का ही उत्तर छात्रों को करना होता है. प्रत्येक प्रश्न 2 अंको का होगा और इस प्रकार, इस खंड में 6 अंक के पूरे प्रश्न होंगे.
  • प्रश्न 4 और 5 दीर्घ-उत्तरीय प्रश्न होंगे. इन प्रश्नों में भी विकल्प मौजूद होंगे और आपको केवल एक का ही उत्तर करना होगा. प्रत्येक प्रश्न के लिए, 4 अंक दिए जाएंगे यानी दोनों प्रश्नों के लिए 8 अंक आवंटित किए होंगे.
  • प्रश्न संख्या 6 में दो परियोजनाएं शामिल हैं और छात्रों को केवल दो में से एक का उत्तर करना होगा. इस प्रश्न में 6 अंक आवंटित होंगे.

नीचे दिए गए अनुसूची के अनुसार छात्रों को AIS द्वारा एनआईओएस असाइनमेंट प्रदान किए जाते हैं:

नोट: यदि असाइनमेंट सबमिशन की अंतिम तिथि पब्लिक हॉलिडे/शनिवार/रविवार को पड़ती है, तो अगले कार्य दिवस को एनआईओएस असाइनमेंट सबमिशन के लिए अंतिम तिथि माना जाएगा.

एनआईओएस असाइनमेंट का महत्व:

माध्यमिक स्तर के लिए TMA एनआईओएस असाइनमेंट का वेटेज 20% की अंको का होगा. अंतिम परीक्षाओं के बाद छात्रों की मार्क शीट पर अलग से (एक अलग कॉलम में) इन अंकों का भी उल्लेख किया जाएगा.

छात्रों को यह भी समझ आजायेगा की एग्जाम के समय सटीक प्रश्नों का उत्तर किस प्रकार करना है.

छात्रों को ट्यूटर्स से मिले फीडबैक की मदद से आसानी से पता चल जाएगा की उन्हें अपने पाठ्यक्रम में और कितनी मेहनत करनी है.

शिक्षण विधियाँ

जिस ढंग से शिक्षकशिक्षार्थी को ज्ञान प्रदान करता है उसे शिक्षण विधि कहते हैं। “शिक्षण विधि” पद का प्रयोग बड़े व्यापक अर्थ में होता है। एक ओर तो इसके अंतर्गत अनेक प्रणालियाँ एवं योजनाएँ सम्मिलित की जाती हैं, दूसरी ओर शिक्षण की बहुत सी प्रक्रियाएँ भी सम्मिलित कर ली जाती हैं। कभी-कभी लोग युक्तियों को भी विधि मान लेते हैं; परंतु ऐसा करना भूल है। युक्तियाँ किसी विधि का अंग हो सकती हैं, संपूर्ण विधि नहीं। एक ही युक्ति अनेक विधियों में प्रयुक्त हो सकती है।

निगमनात्मक तथा आगमनात्मकसंपादित करें

पाठ्यविषय को प्रस्तुत करने के दो ढंग हो सकते हैं। एक में छात्रों को कोई सामान्य सिद्धांत बताकर उसकी जाँच या पुष्टि के लिए अनेक उदाहरण दिए जाते हैं। दूसरे में पहले अनेक उदाहरण देकर छात्रों से कोई सामान्य नियम निकलवाया जाता है। पहली विधि को निगमनात्मक विधि और दूसरी को आगमनात्मक विधि कहते हैं। ये विधि व्याकरण शिक्षण के लिए सबसे उपयुक्त मानी जाती है।

संश्लेषणात्मक तथा विश्लेषणात्मकसंपादित करें

दूसरे दृष्टिकोण से शिक्षण विधि के दो अन्य प्रकार हो सकते हैं। पाठ्यवस्तु को उपस्थित करने का ढंग यदि ऐसा हैं कि पहले अंगों का ज्ञान देकर तब पूर्ण वस्तु का ज्ञान कराया जाता है तो उसे संश्लेषणात्मक विधि कहते हैं। जैसे हिंदीपढ़ाने में पहले वर्णमाला सिखाकर तब शब्दों का ज्ञान कराया जाता है। तत्पश्चात् शब्दों से वाक्य बनवाए जाते हैं। परंतु यदि पहले वाक्य सिखाकर तब शब्द और अंत में वर्ण सिखाए जाएँ तो यह विश्लेषणात्मक विधि कहलाएगी क्योंकि इसमें पूर्ण से अंगों की ओर चलते हैं।

वस्तुविधिसंपादित करें

शिक्षण का एक प्रसिद्ध सूत्र हैं – “मूर्त से अमूर्त की ओर“। वास्तव में हमें बाह्य संसार का ज्ञान अपनी ज्ञानेंद्रियों के द्वारा होता है जिनमें नेत्र प्रमुख हैं। किसी वस्तु पर दृष्टि पड़ते ही हमें उसका सामान्य परिचय मिल जाता है। अत: मूर्त वस्तु ज्ञान प्रदान करने का सबसे सरल साधन है। इसीलिये आरंभ से वस्तुविधि का सहारा लिया जाता है अर्थात् बच्चों को पढ़ाने के लिए वस्तुओं का प्रदर्शन करके उनके विषय में ज्ञान प्रदान किया जाता है। यहाँ तक कि अमूर्त को भी मूर्त बनाने का प्रयास किया जाता है। जैसे, तीन और दो पाँच को समझाने के लिए पहले छात्रों के सम्मुख तीन गोलियाँ रखी जाती हैं। फिर उनमें दो गोलियाँ और मिलाकर सबको एक साथ गिनाते हैं तब तीन और दो पाँच स्पष्ट हो जाता है।

दृष्टांतविधिसंपादित करें

वस्तुविधि का एक दूसरा रूप है – दृष्टांतविधि। वस्तुविधि में जिस प्रकार वस्तुओं के द्वारा ज्ञान प्रदान किया जाता है दृष्टांतविधि में उसी प्रकार दृष्टांतों के द्वारा। दृष्टांत दृश्य भी हो सकते हैं और श्रव्य भी। इसमें चित्रमानचित्रचित्रपट आदि के सहारे वस्तु का स्पष्टीकण किया जाता है। साथ ही उपमाउदाहरणकहानीचुटकुले आदि के द्वारा भी विषय का स्पष्टीकरण हो सकता है।

कथनविधि एवं व्याख्यानविधिसंपादित करें

वस्तु एवं दृष्टांतविधियों से ज्ञान प्राप्त करते करते जब बच्चों को कुछ कुछ अनुमान करने तथा अप्रत्यक्ष वस्तु को भी समझने का अभ्यास हो जाता है तब, कथनविधि का सहारा लिया जाता है। इसमें वर्णन के द्वारा छात्रों को पाठ्यवस्तु का ज्ञान दिया जाता है। परंतु इस विधि में छात्र अधिकतर निष्क्रिय श्रोता बने रहते हैं और पाठन प्रभावशाली नहीं होता। इसी से प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री हर्बर्ट स्पेंसर ने कहा है- “बच्चों को कम से कम बतलाना चाहिए, उन्हें अधिक से अधिक स्वत: ज्ञान द्वारा सीखना चाहिए”। व्याख्यानविधिइसी की सहचरी है। उच्च कक्षाओं में प्राय: व्याख्यानविधि का ही प्रयोग लाभदायक समझा जाता है।

कथनविधि में प्राय: हर्बर्ट के पाँच सोपानों का प्रयोग किया जाता है। वे हैं(1) प्रस्तावना, (2) प्रस्तुतीकरण, (3) तुलना या सिद्धांतस्थापन, (4) आवृत्ति, (5) प्रयोग।

परंतु केवल ज्ञानार्जन के पाठों में ही पाँचों सोपानों का प्रयोग होता है। कौशल तथा रसास्वादन के पाठों में कुछ सीमित सोपानों का ही प्रयोग होता है।

प्रश्नोत्तर विधि (सुकराती विधि)संपादित करें

प्रश्न यद्यपि एक युक्ति है फिर भी सुकरात ने प्रश्नोत्तर को एक विधि के रूप में प्रयोग करके इसे अधिक महत्व प्रदान किया है। इसी से इसे सुकराती विधि कहते हैं। इसमें प्रश्नकर्ता से ही प्रश्न किए जाते हैं और उसके उत्तरों के आधार पर उसी से प्रश्न करते-करते अपेक्षित उत्तर निकलवा लिया जाता है।

करके सीखनासंपादित करें

जब से बाल मनोविज्ञान के विकास ने यह सिद्ध कर दिया है कि शिक्षा का केंद्र न तो विषय है, न अध्यापक, वरन् छात्र है, तब से शिक्षण में सक्रियता को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। करके सीखना (learning by doing) अर्थात् स्वानुभव द्वारा ज्ञान प्राप्त करना, आजकल का सर्वाधिक व्यापक शिक्षणसिद्धांत है। अत: रूसों से लेकर मांटेसरी और ड्यूबी तक शिक्षाशास्त्रियों ने बच्चों की ज्ञानेंद्रियों को अधिक कार्यशील बनाने तथा उनके द्वारा शिक्षा देने पर अधिक बल दिया है। महात्मा गांधी ने भी इसी सिद्धांत के आधार पर बेसिक शिक्षा को जन्म दिया। अत: सक्रिय विधि के अंतर्गत अनेक विधियाँ सम्मिलित की जा सकती हैं जैसे- शोधविधि(ह्यूरिस्टिक), योजना (प्रोजेक्ट) विधिडाल्टन प्रणालीबेसिक-शिक्षा-विधि, इत्यादि।

शोधविधिसंपादित करें

जर्मनी के प्रोफेसर आर्मस्ट्रौंग द्वारा शोधविधि का प्रतिपादन हुआ था। इस विधि में छात्रों को उपयुक्त वातावरण में रखकर स्वयं किसी तथ्य को ढूढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है। इसका यह अर्थ नहीं है कि अध्यापक कुछ नहीं करता और छात्रों को मनमाना काम करने को छोड़ देता है। सच पूछिए तो वह छात्र का पथप्रदर्शन करता तथा उसे गलत रास्ते से हटाकर सीधे रास्ते पर लाता रहता है। उसका लक्ष्य यह रहता है कि जो ज्ञान छात्र अपने निरीक्षण अथवा प्रयोग द्वारा प्राप्त कर सकता है उसे बताया न जाए। इस विधि का प्रयोग पहले तो विज्ञान की शिक्षा में किया गया। फिर धीरे-धीरे गणितभूगोल तथा अन्य विषयों में भी इसका प्रयोग होने लगा।

प्रोजेक्ट विधिसंपादित करें

अमरीका के प्रसिद्ध शिक्षाशास्त्री ड्यूवी, किलपैट्रिक, स्टीवेंसन आदि के सम्मिलित प्रयास का फल योजना (प्रोजेक्ट) विधि है। इसके अनुसार ज्ञानप्राप्ति के लिए स्वाभाविक वातावरण अधिक उपयुक्त होता है। इस विधि से पढ़ाने के लिए पहले कोई समस्या ली जाती है, जो प्राय: छात्रों के द्वारा उठाई जाती है और उस समस्या का हल करने के लिए उन्हीं के द्वारा योजना बनाई जाती है और योजना को स्वाभाविक वातावरण में पूर्ण किया जाता है। इसी से इसकी परिभाषा इस प्रकार की जाती है कि योजना वह समस्यामूलक कार्य है जो स्वाभाविक वातावरण में पूर्ण किया जाए।

डाल्टन योजनासंपादित करें

अमरीका के डाल्टन नामक स्थान में 1912 से 1915 के बीच कुमारी हेलेन पार्खर्स्ट्र ने शिक्षा की एक नई विधि प्रयुक्त की जिसे डाल्टन योजना कहते हैं। यह विधि कक्षाशिक्षण के दोषों को दूर करने के लिए आविष्कृत की गई थी। डाल्टन योजना में कक्षाभवन का स्थान प्रयोगशाला ले लेती है। प्रत्येक विषय की एक प्रयोगशाला होती है, जिसमें उस विषय के अध्ययन के लिए पुस्तकें, चित्र, मानचित्र तथा अन्य सामग्री के अतिरिक्त सन्दर्भग्रंथ भी रहते हैं। विषय का विशेषज्ञ अध्यापक प्रयोगशाला में बैठकर छात्रों की सहायता करता है, उनके कार्यों की जाँच तथा संशोधन करता है। वर्ष भर का कार्य 9 या 10 भागों में बाँटक निर्धारित कार्य (असाइनमेंट) के रूप में प्रत्येक छात्र को लिखित दिया जाता है। छात्र उस निर्धारित कार्य को अपनी रुचि के अनुसार विभिन्न प्रयोगशालाओं में जाकर पूरा करता है। कार्य अन्वितियों में बँटा रहता है। जितनी अन्विति का कार्य पूरा हो जाता है उतनी का उल्लेख उसके रेखापत्र (ग्राफकार्ड) पर किया जाता है। एक मास का कार्य पूरा हो जाने पर ही दूसरे मास का निर्धारित कार्य दिया जाता है। इस प्रकार छात्र की उन्नति उसके किए हुए कार्य पर निर्भर रहती है। इस योजना में छात्रों को अपनी रुचि और सुविधा के अनुसार कार्य करने की छूट रहती है। मूल स्रोतों से अध्ययन करने के कारण उनमें स्वावलंबन भी आ जाता है। इस योजना के अनेक रूपांतर हुए जैसे- बटेविया, विनेटका आदि योजनाएँ। डेक्रौली योजना यद्यपि इससे पूर्व की है, फिर भी उसके सिद्धांतों में डाल्टन योजना के आधार पर परिवर्तन किए गए।

वर्धा योजना या बुनियादी तालीमसंपादित करें

मुख्य लेख: वर्धा शिक्षा योजना

महात्मा गांधी की वर्धा योजना या बेसिक शिक्षा (बुनियादी तालीम) भी अपने ढंग की एक शिक्षाविधि है। गांधी जी ने देश की तत्कालीन स्थिति को देखते हुए शिक्षा में ‘हाथ के काम’ को प्रधानता दी। उनका विश्वास था कि जब तक छात्र हाथ से काम नहीं करता तब तक उसे श्रम का महत्व नहीं ज्ञात होता। सैद्धांतिक ज्ञान मनुष्य को अहंकारी एवं निष्क्रिय बना देता है। अत: बच्चों को आरंभ से ही किसी न किसी हस्तकौशल के द्वारा शिक्षा देनी चाहिए। हमारे देश में कृषिएवं कताई-बुनाई बुनियादी धंधे हैं जिनमें देश की तीन चौथाई जनता लगी हुई है। अत: उन्होंने इन्हीं दोनों को मूल हस्तकौशल मानकर शिक्षा में प्रमुख स्थान दिया। बेसिक शिक्षा की प्रमुख विशेषताएँ हैं :-

  • (1) मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा,
  • (2) हस्तकौशल केंद्रित शिक्षा,
  • (3) सात से 14 वर्ष तक निःशुल्क अनिवार्य शिक्षा,
  • (4) शिक्षा स्वावलंबी हो, अर्थात् कम से कम अध्यापकों का वेतन छात्रों के किए हुए कार्यों की बिक्री से आ जाए।

अंतिम सिद्धांत का बड़ा विरोध हुआ और बेसिक शिक्षा में से हटा दिया गया।

अंग्रेजी शिक्षा ने देश के अधिकांश शिक्षित वर्ग को ऐसा पंगु बना दिया है कि वे हाथ से काम करना हेय मानते हैं। यही कारण है कि संपन्न तथा उच्च वर्ग के लोगों ने बुनियादी शिक्षा के प्रति उदासीनता दिखाई जिससे यह शिक्षा केवल निर्धन वर्ग के लिए रह गई है। अत: यह धीरे-धीरे असफल होती जा रही है।

उपर्युक्त विवेचन से यह स्पष्ट है कि शिक्षणविधियाँ अनेक हैं। सबका प्रवर्तन किसी न किसी विशेष परिस्थिति में किसी शिक्षाशास्त्री के द्वारा हुआ है। वास्तव में प्रत्येक अध्यापक की अपनी शिक्षाविधि होती है जिससे व छात्रों को उनकी रुचि तथा योग्यता के अनुरूप ज्ञान प्रदान करता है। जो विधि जिसके लिए अधिक उपयोगी हो वही उसके लिए सर्वश्रेष्ठ विधि है।

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018/ इंडिया के टॉप हिंदी ब्लॉग

जब मैंने इस पोस्ट को लिखने के बारे में सोचा तो सबसे पहले यही विचार आया कि कही कोई गलती ना हो जाए…..ऐसा ना हो कि कोई ब्लॉग मेरे से छुट जाये. तो आर्टिकल शुरू करने से पहले ही अगर मेरे से यहाँ कोई ब्लॉग जो टॉप 10 की लिस्ट में आता है और मेरे से रह जाता है कृपया करके एक बार जरुर ध्यान दिलाये जिससे मैं अपनी गलती को सुधार सकूँ.

आज से 5-6 साल पहले इन्टरनेट पर ज्यादातर ब्लॉग और वेबसाइट इंग्लिश भाषा में ही हुआ करती थीं और उस टाइम में कोई आर्टिकल इन्टरनेट पर लोगों को अगर हिंदी भाषा में मिल जाता था तो वो उसको पूरा और कई कई बार पढ़ते थे और मन में एक अजीब सी ख़ुशी भी महसूस होती थी.

दरअसल अपनी मातृभाषा का अलग ही आनंद है और अब तो 2018 में काफी ब्लॉग और वेबसाइट हिंदी भाषा में हैं, अच्छा लगता है…..और गर्व भी.

कुछ ब्लॉग तो इतने अच्छे हैं कि मैं बता नही सकता जिनमें भारत का इतिहास, महापुरुषों की जीवन गाथाएं, प्रेरणादायक कहानियाँ आदि इतने अच्छे तरीके से उनका वर्णन है कि मन मोह लेती हैं.

जब छोटे थे तो कॉमिक, उपन्यास आदि पढ़ा करते थे और जब बड़े हो गये तो इसकी कमी सी महसूस होती थी….लेकिन तहे दिल से धन्यवाद उन लोगों का जिन्होंने इन्टरनेट के माध्यम से हिंदी भाषा को एक नया जीवंत दिया और हमारी उस कमी को समझते हुए अपना कीमती समय देकर हिंदी भाषा को अमूल्य योगदान दिया.

तो चलिए अपनी बात को ज्यादा लंबा ना किचते हुए शुरू करते हैं भारत के टॉप 10 हिंदी ब्लॉगर की लिस्ट जिन्होंने अपने दम पर ही इन्टरनेट पर हिंदी और भारत को अपने आप को अर्पित किया “Top 10 Hindi Blogs list in India 2018”.

इंडिया के टॉप 10 ब्लॉग लिस्ट

1). Achhikhabar – Spreading Positivity

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018

सर गोपाल मिश्रा जी द्वारा शुरू किया गया ये ब्लॉग अपने आप में अनोखा है जिसमें अनमोल विचार, हिंदी कहानियां, निबंध, प्रेरणा दायक वचन, कवितायेँ…..आदि पर बहुत सुंदर ढंग से प्रकाश डाला है. भारत में सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला ये ब्लॉग अपने आप में अध्बुत है, जिसके पाठक लगभग हर रोज इस ब्लॉग पर आते हैं.

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Top keywords –

Achhikhabar

Hindi quotes

Hindi story

कबीर के दोहे

2). Deepawali – Divine Light of Information in Hindi

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018

ये एक बहुत ही सुंदर हिंदी ब्लॉग है जिसमेभारतीय पर्व, हिंदी लेख, जीवनी, कवितायेँ, हिंदी कहानी, अनमोल वचन…..जैसे आदि टॉपिक पर बहुत ही सुंदर वर्णन के साथ प्रस्तावित किया है.

Alexa Rank – 3595

Global Rank – 46177

Top keywords –

Business ideas in Hindi

बेटी बचाओ बेटी पढाओ

हिंदी दिवस

3). Hindi Soch – India’s Top Hindi Motivational Blog

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018

ये ब्लॉग अपने आप में एक गहरे सागर के समान है जिसकी गहराई का तो हम सिर्फ अंदाज़ा ही लगा सकते हैं. भारतीय लोगों में हिंदी भाषा के प्रति जागरूकता को बनाये रखने के लिए पवन कुमार जी ने अपने इस ब्लॉग में जैसे गागर में सागर भर दिया है.

सुविचार, प्रेरक प्रसंग, शिक्षाप्रद कहानियां, सफलता …..आदि इन्होने अपने ब्लॉग के विषयों का चयन किया है. हिंदीसोच ब्लॉग भारत के प्रसिद्ध ब्लॉग में से एक है जहाँ लाखों लोग इनको पसंद करते हैं.

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Top Keywords –

Motivational Stories in Hindi

Success stories in Hindi

प्रेरक प्रसंग

4). Ajab Gjab

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ये एक ऐसा हिंदी ब्लॉग है जो लोगों को विभिन्न और अजीबो-गरीब जानकारी देते हैं जिसकी ज्यादातर जानकारी लोगों को नही होती. भारतीय पर्व, ज्योतिष, ग्रहण, ग़ज़ल, शायरी, मंदिर….इत्यादि विचयों पर इन्होने चर्चा की है.

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Global Rank: 60093

Top Keywords –

अजब गजब

पागल लड़की

Bhangarh Fort

5). SupportMeIndia – Internet ki Jankari Hindi me!

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Jume deen ji द्वारा शुरू किया गया ये ब्लॉग नए ब्लॉगर के लिए बहुत ही उपयोगी है जिसमें SEO, wordpress और ब्लॉगिंग से related लगभग सभी जानकारी को एक ही plateform पर लाया गया है. जब कभी भी कोई व्यक्ति अपनी नयी वेबसाइट या ब्लॉग बनाने के बारे में सोचता है और इन्टरनेट से सीखता है तो मैं सुझाव दूंगा कि इस ब्लॉग को daily समय दें क्युकी जिस ब्लॉग की जानकारियां अपने आप में बहुत अहम् हैं.

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Top Keywords –

Supportmeindia

Inernet se paise kaise kamaye

Youtube से paise kaise kamaye

Seo in Hindi

6). HindimeHelp

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018

ये ब्लॉग एक टेक्निकल ब्लॉग है जिसमेंInternet, Blogging, Make Money, SEO…..आदि अनेक टेक्निकल टॉपिक पर काफी अच्छे से प्रकाश डाला गया है. रोहित जी ने इस ब्लॉग को 2015 में शुरू किया था जो आज हिंदी ब्लॉग की टॉप 10 लिस्ट में शामिल है.

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Top Keywords –

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On page seo kya h

Whatsapp se paise kaise kamaye

7). ShoutmeHindi

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ये ब्लॉग pure technical ब्लॉग है जो हर्ष अग्रवाल जी के ShoutmeLoud का ही हिंदी version है. हर्ष जी ने नए ब्लॉगर की सुविधा के लिए और उनके concepts अच्छे से clear करने के लिए हिंदी भाषा में नया ब्लॉग बनाया जोBlogging, SEO, wordpress, Hosting…..जैसे टॉपिक से परिपूर्ण है.

Alexa Rank: 12971

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Top Keywords –

Shoutmehindi

shoutmeloud hindi

Blogging tips in hindi

Paise kaise kamaye

8). BccFalna

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018

ये ब्लॉग अपने आप में technical knowledge से भरा है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोगों को हिंदी भाषा में programming और coding जैसे टॉपिक को समझाना है. C language, php, wordpress visual studio….आदि पर इन्होने काफी अच्छी अच्छी जानकारी के साथ साथ E-books भी लिखी हैं जो काफी अच्छी हैं और programming के जैसे सभी टॉपिक्स के concepts clear करने के लिए काफी हैं.

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Top Keywords –

C in hindi

Java in hindi

SQL injection in hindi

9). MyBigGuide

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018

ये हिंदी ब्लॉग अपने आप में technical knowledge से भरा हुआ है जिसमेंProgramming, Networking, Android, Software….आदि को बहित ही सुंदर तरीके से समझाया गया है. अगर आप टेक्नोलॉजी में रूचि रखते हैं तो यकीं मानिए ये ब्लॉग और इसके आर्टिकल आपके लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं.

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Computer in Hindi

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Cloud computing kya h

Software kya hai

10). HindiMe

Top 10 Hindi Blogs list in India 2018

ये ब्लॉग भी technical ब्लॉग ही है जिसमेंBlogging, Internet, SEO, Technology…..आदि से जुडी पोस्ट रहती हैं, जिसका 52% traffic google से आता है. Google adsense से related यहाँ काफी अर्त्सिले भी हैं जिसमें लोगों की help के लिए काफी अच्छे से समझाया गया है.

Alexa Rank: 9328

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Top Keywords –

Google adsense kya h

Blog kaise bnaye

Bitcoin kya h

hindime

CONCLUSION

ये सभी ब्लॉग वाकई बहुत अविश्वसनीय ब्लॉग हैं जिनमे जानकारी और ज्ञान का अथाह भण्डार है. इंडिया में अब 40% लोग ऐसे हैं जो इन्टरनेट पर हिंदी में ही सर्च करते हैं और जिससे वो बहुत ही जल्दी और तेज़ी के साथ सीखते हैं. जैसे अगर आप कोई ब्लॉग बनाना चाहते हैं और आपको उसके बारे में कुछ भी नही पता तो इन्टरनेट पर हिंदी में काफी अच्छे अच्छे ब्लॉग पर बहुत ही सुंदर ढंग से समझाया गया है जिससे आप अपने सभी concepts आसानी से सोल्व कर सकते हैं.

मैं शुक्रिया करना कहता हूँ इन सभी ब्लॉगर का जिन्होंने अपना समय हिंदी भाषा को देकर उसको इन्टरनेट पर लाकर अमूल्य योगदान दिया और उम्मीद है कि भारत के लोग इन सभी ब्लॉगर को support करेंगे जैसा कि कर भी रहे हैं.

502- NIOS D.EL.ED. ASSIGNMENT 3 – सत्रीय कार्य – lll – 1000 शब्दों में यूनिक उत्तर

Q. मान लीजिये कि ऐसे विद्यालय में कार्यरत हैं जिसमें ज्यादातर बच्चे किसी विशिष्ट….

502- NIOS D.EL.ED. ASSIGNMENT 3 – सत्रीय कार्य – lll – 1000 शब्दों में यूनिक उत्तर 

ANS. स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से जनजातीय व्यक्तियों को मुख्य धारा से जोड़ने हेतु उनके समग्र विकास हेतु कई प्रयास किये गए हैं l परन्तु आज भी जनजातीय लोगों की समस्या विचारणीय बनी हुई है l भारत की जनगणना 2001 के अनुसार जनजाति की साक्षरता दर बहुत कम है और जनजातीय बालिकाओं के सन्दर्भ में यह अत्यंत शोचनीय है l विद्यालयों में जनजातीय बच्चों का नामांकन अन्य समूहों की तुलना में कम है l आधे से अधिक संख्या में जनजातीय बच्चे प्रारंभिक शिक्षा पूर्ण करने से पूर्व ही विद्यालय छोड़ देते हैं l साधारणतया विद्यालय की भाषा जनजातीय बच्चे के घर की भाषा से बिलकुल भिन्न होती है l इस कारण वे कक्षा-शिक्षण एवं पाठ्यपुस्तकों की भाषा को समझने में कठिनाई का सामना करते हैं l परिणामस्वरूप वे पढने तथा सुनने में निम्न स्तर का प्रदर्शन करते हैं तथा दूसरों के साथ संप्रेषण की योग्यता का विकास भी उनमें ठीक तरह से नहीं होता है l

चूँकि मातृभाषा द्वारा अवधारणाओं को उत्तम रूप से समझा जाता है इसलिए बच्चे जो भाषा बोलते हैं और ठीक से समझते हैं, उसके द्वारा शिक्षण होने से वह बेहतर सीखते हैं l लेकिन जब कक्षा में जनजातीय बच्चों को किसी अन्य भाषा में पढाया जाता है तो बच्चे रुचिहीन प्रतीत होते हैं और शिक्षक जो कुछ भी पढ़ा रहा होता है वह उसके समझ से बिल्कुल परे होता है l वे शिक्षक को लगातार देखते रहते हैं और कभी-कभी ब्लैक बोर्ड पर लिखे शब्दों और अक्षरों को भी l इस स्थिति में शिक्षण बच्चों के लिए एक बोझ बन जाता है और जो बच्चे इस बोझ को सहन नहीं कर पाते विद्यालय छोड़ देते हैं l अतः इस प्रकार के जनजातीय बच्चों को सिखाने हेतु कई प्रकार की गतिविधियाँ की जा सकती हैं जिसे निम्नलिखित बिन्दुओं द्वारा दर्शाया गया हैं l1. बच्चों की मातृभाषा सीखना – हालाँकि प्रत्येक बच्चे की मातृभाषा को सीखना संभव नहीं है फिर भी यदि शिक्षक बच्चों की मातृभाषा का ज्ञाता अगर हो जाता है तो उसका काफी हद तक काम आसान हो जाता है l अतः मैं समर्पित भाव से बच्चों की मातृभाषा उनके तथा समुदाय के लोगों से अंतः क्रिया कर सीख सकता हूँ l2. मातृभाषा को शिक्षण के माध्यम के रूप में प्रयोग करना– जैसा कि मैंने ऊपर बताया है कि बच्चों को अगर उनके परिचित भाषा में पढाया जाए तो वो उसे आसानी से समझ पाता है l जैसे कि कक्षा 1 की संथाली ‘आलाह’ समझ सकती है परन्तु ‘घर’ नहीं , ‘मिरोम’ परन्तु ‘बकरी’ नहीं,  ‘डाका’ परन्तु ‘चावल’ नहीं l वह ‘घर’ के बारे में अपनी मातृभाषा में 5-10 वाक्य भी बोल सकती है परन्तु अन्य भाषा जो उनके लिए विदेशी हैं , हो सकता है कि उसमें वह एक शब्द भी न बोल पाए l इसलिए मातृभाषा का उपयोग शिक्षण – अधिगम के रूप में करने से बच्चे को अवधारणा समझने में आसानी होती है , बल्कि इससे उसमें आत्मविश्वास भी उत्पन्न होता है l अतः मैं हमेशा उनकी मातृभाषा में ही शिक्षण करने का प्रयास करूँगा l 3. अधिगम – शिक्षण प्रक्रिया में स्थानीय ज्ञान का समावेश– मैं अपने शिक्षण –अधिगम प्रक्रिया में स्थानीय एव क्षेत्रीय ज्ञान को समाहित करना चाहूँगा क्योंकि ऐसा करने से उन्हें पाठ्यचर्या को समझने में सहूलियत होगा l उदहारण के लिए , अगर मुझे गणित विषय में मापन की प्रक्रिया को समझाना है तो सबसे पहले मुझे स्थानीय मापन के शब्द जैसे – सेर, मन आदि के शब्दों को बताना पड़ेगा तब जाकर वह गणित के उक्त प्रक्रिया को स्वयं से जोड़कर समझ पायेगा l4. कक्षा अधिगम में लोक सामग्री का उपयोग – प्रत्येक समुदाय में उनकी अपनी लोक कथाएं , गीत , पहेलियाँ , कला तथा पेंटिंग्स आदि होती हैं l शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में इन चीजों को शामिल कर मैं अध्ययन सामग्री को तो सरल बना ही सकता हूँ साथ ही यह आनंदायक भी होगा और अधिगम प्रतिफल की प्राप्ति भी सहज हो जायेगा l5. सामाजिक-सांस्कृतिक ज्ञान वाली पाठ्यपुस्तकों को अपनाना – पाठ्य-पुस्तकों को अपनाने का अर्थ है कि सामाजिक-सांस्कृतिक तत्वों को पाठ्यपुस्तक की विषय वस्तु में रखना तथा जहाँ आवश्यक हो वैकल्पिक विषय वस्तु तैयार करना ताकि बच्चों का अधिगम अनुभव आधारित हो जाए l6. समुदाय से सांस्कृतिक ज्ञान प्राप्त करना – एक शिक्षक होने के नाते मुझे बच्चों के समुदाय का ज्ञान प्राप्त करना आवश्यक है l इसके लिए मुझे उनके समुदाय में घुलना मिलना होगा और उनके लोगों से बात करनी होगी , उनसे सामाजिक-सांस्कृतिक विषयों पर चर्चा करनी होगी तथा उनके पर्व-त्योहारों में शामिल होना होगा l इन सब के लिए मुझे खुद में बदलाव लाकर सीखने की ललक पैदा करनी होगी l7. विद्यालय क्रियाकलाप में समुदाय को शामिल करना – मैं अपने शिक्षण अधिगम प्रक्रिया में समुदाय को शामिल कर रोचक बनाना चाहूँगा l जैसे कि समुदाय के सदस्य बच्चों को स्थानीय कला, क्राफ्ट , गीत, संगीत, कहानी और अन्य अच्छी प्रथाएं सिखाने में हमारी मदद कर सकते हैं l विद्यालय प्रबंध तथा कक्षा कक्ष की गतिविधियों में समुदाय को शामिल करने से बच्चों की निष्पति में सकारात्मक परिवर्तन आता है l अतः मैं समुदाय के संसाधनों का भरपूर उपयोग करना चाहूँगा l8. बहुभाषी शब्दकोष – इस कड़ी में मैं अपने कक्षा के बच्चों के मातृभाषा के शब्दों को लेकर एक बहुभाषी शब्द्कोष बना सकता हूँ l यह प्रक्रिया न सिर्फ बच्चों के शब्द ज्ञान को बढ़ाएगा बल्कि उन्हें अन्य भाषा को तेजी से सीखने में भी मदद करेगा और उनमें समझने सीखने की शक्ति को बढ़ाएगा l9. शब्द पहचान कार्ड– यह एक बेहतर सामग्री है उन सभी शिक्षकों के लिए जो जनजातीय भाषा को नहीं जानते हैं l इस प्रक्रिया में बच्चों की सहायता से अक्षरों का उनकी मातृभाषा में एक सचित्र कार्ड बना कर दिखाया जा सकता है और बाद में उसे उसी अक्षर से अन्य भाषा के अक्षर को बताया जा सकता है l10. पूर्ण शारीरिक प्रत्युतर – जनजातीय बच्चे भले ही हमारी भाषा को न समझे लेकिन शारीरिक हरकत को पहचान कर वे उसे जरुर समझ सकते है जैसे कि अगर उनसे कहा जाए बैठ जाओ, खड़े हो जाओ, अपना माथा छुओ, घूम जाओ, अपना पेन पकड़ो, अपनी नाक छुओ, आदि साथ ही शारीरिक गतिविधि भी दिखाया जाए तो वह बिना कोई भाषा जाने उन गतिविधियों को आसानी से फोलो कर सकता है l ये पूर्ण शारीरिक प्रत्युतर (TPR- Total Physical Response) कहलाता है l यह एक प्रकार की ‘सुनो और करो’ क्रियाकलाप है l इस TPR प्रक्रिया से शुरुआती कक्षाओं में बच्चों में द्विभाषा का विकास किया जा सकता है l इस प्रक्रिया में बच्चे शिक्षक की क्रिया तथा मौखिक आदेश साथ-साथ देखते व सुनते हैं और उसका प्रत्युतर स्वरुप उन क्रियाओं को करते हैं l इन क्रियाओं को करते हुए बच्चे धीरे-धीरे द्वितीय भाषा में उनका अर्थ अर्जित कर लेते हैं l इस प्रकार मातृभाषा रहित शिक्षक भी जनजातीय बच्चों को अच्छे से शिक्षण प्रदान कर सकते हैं l
अतः बहुभाषी शिक्षा कार्यक्रम, समुदाय की भाषा, सांस्कृतिक सन्दर्भों का प्रयोग, लोक कलाओं की सामग्री का उपयोग, TPR आदि ऐसे कई नवाचार के प्रयोग से मैं जनजतीय बच्चों के मातृभाषा को न जानते हुए भी उन्हें बहुत कुछ सीखा व पढ़ा सकता हूँ l 

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ASSIGNMENT IN HINDI – असाइनमेंट क्या है और इसे आकर्षक तरीके से कैसे लिखें ?

आप जानते हैं कि किसी भी शैक्षणिक प्रोग्राम का असाइनमेंट लिखना कितना महत्वपूर्ण है l  आप इसे हलके में नहीं ले सकते l अगर आप इसे हलके में ले रहे हैं तो आप गलत कर रहे हैं l तो आज हम इस लेख- ASSIGNMENT IN HINDI – असाइनमेंट क्या है और इसे आकर्षक तरीके से कैसे लिखें – में चर्चा करेंगे कि असाइनमेंट क्या है , इसे बेहतर तरीके से कैसे लिखा जा सकता है और सबसे बड़ा सवाल कि क्या आप दुसरे का लिखा असाइनमेंट कॉपी कर सकते हैं ?

असाइनमेंट यानि सत्रीय कार्य क्या है ?इसका जवाब इसके उद्धेश्य में निहित है l अर्थात सत्रीय कार्य का मुख्य उद्धेश्य यह जांचना है कि आपने पाठ्य सामग्री को कितना समझा है और आप स्वयं उसे अपने शब्दों में कैसे प्रस्तुत कर सकते हैं ? मतलब ये है कि पाठ्यक्रम के अध्ययन के दौरान आपने जिस क्षेत्र का ज्ञान प्राप्त किया है उसमें आपने कितनी कुशलता प्राप्त कर ली है l

क्या आप दुसरे का असाइनमेंट कॉपी कर सकते हैं ?जाहिर है इसका जवाब होगा नहीं , क्योंकि अगर आप दुसरे का कॉपी करते है तो आपके जैसा सैकड़ो – हजारों होंगे जिसका जवाब हु-बहु एक जैसा मिलता होगा और जांचकर्ता को यह समझते देर नहीं लगेगी कि आपने कॉपी किया है l तो ऐसे में क्या होगा ? होगा यही कि वह आपका असाइनमेंट आपको वापस लौटा सकता है या अगर नहीं भी लौटाए तो एक औसत मार्क्स आपको दे देगा और आप अच्छा ग्रेड नहीं ला सकते l तो कॉपी करने में ज्यादा रिस्क है l ऐसे में सवाल उठता है कि अगर कॉपी न करें तो एक अच्छा असाइनमेंट कैसे लिखे ?

assignment

असाइनमेंट कैसे लिखे ?असाइनमेंट कैसे लिखे इस पहले हम यह भी जान ले कि असाइनमेंट लिखने के लिए आपको किन-किन चीजों की जरूरत है l सबसे पहले आप मार्किट से बड़े आकर के पेपर या प्रोजेक्ट पेपर खरीद लें साथ ही ब्लू बॉल पेन भी l हैडिंग लिखने के लिए आप अलग अलग रंग का इस्तेमाल कर सकते हैं जो रोचक लगेगा lअब आप असाइनमेंट लिखना शुरू कर सकते हैं l इसके लिए आप निम्न मुख्य बिन्दुओं को ध्यान में रखें –

  • सबसे पहले आप रफ़ वर्क करें l
  • असाइनमेंट के सवाल को अच्छी तरह पढ़कर समझ लें l
  • फिर प्रश्न से रिलेटेड पाठ इकाई पढ़ें l
  • जवाब से सम्बंधित पॉइंट बनाये l
  • प्रश्न से सम्बंधित शुरुआत में संक्षिप्त व्याख्या लिखें l
  • उत्तर के मध्य में पॉइंट को विस्तृत करें l
  • निर्दिष्ट शब्द सीमा में ही लिखें l
  • जो भी लिखें उसमें आपका expression और style झलकना चाहिए l
  • उत्तर लिखने में भाषा की त्रुटी न हो खासकर मात्रा और व्याकरण सम्बन्धी l

अब आप अपने मुख्य असाइनमेंट पेपर पर लिखना शुरू करें l असाइनमेंट के पहले पन्ने पर आप मुख्य सूचनाये जैसे कि पाठ्क्रम कोड, असाइनमेंट कोड, टॉपिक , आपका नाम, पता जरुर लिखें यह अतिआवश्यक है , इसके बिना आपका असाइनमेंट स्वीकार नहीं होगा l यह भी ध्यान रखिये कि असाइनमेंट हाथ से ही लिखा गया हो l किन्ही विशेष परिस्थिति में ही टाइप करवाने की छुट दी जा सकती है l हर असाइनमेंट का एक अलग फाइल बनाये और ज़ेरॉक्स कॉपी कर एक फाइल अपने पास सुरक्षित जरुर रख लें l बस इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए असाइनमेंट लिखेंगे तो वह आकर्षक भी होगा और यूनिक भी l

अगर यह लेख – ASSIGNMENT IN HINDI – असाइनमेंट क्या है और इसे आकर्षक तरीके से कैसे लिखें – आपको अच्छा लगा हो तो इसे अन्य दोस्तों के साथ जरुर शेयर करें l यदि मन में कोई विचार हो तो निचे कमेंट जरुर करें l हमारे शैक्षणिक वीडियो देखने के लिए हमारा youtube चैनल –https://www.youtube.com/channel/UCsTsDJlggjirlM_qQXJ0Sew

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